Sahasarakshi Siddh Chandi Mantra


सहस्राक्षरी सिद्ध चण्डी महाविद्या  मंत्र 

Sahasarakshi Chandi Mantra

 

Sahasraakshi means thousand eyes whereas SIddh Chandi means Chandi or Durga already invoked and ready to provide fruits and goals to the sadhak. Sahasraakshi Siddha Chandi Mahavidya mantra is a very powerful but rare mantra capable of achieving any task in this world. The objective of Sahasraakshi Siddha Chandi Mahavidya mantra is to accomplish a difficult task of the sadhak or the sponsor of the sadhna. This Sadhana can be accomplished on any auspicious time.

Sahasraakshi Siddha Chandi Mahavidya is a boon to the sadhak. Sahasraakshi Siddha Chandi Mahavidya not only fulfill the desires but also cares the sadhak with Her thousand eyes. Sahasraakshi Siddha Chandi Mahavidya mantra provides the ability to destroy enemies, removes black magic and evil spirits. Sahasraakshi Siddha Chandi Mahavidya provides extra ordinary wisdom and intellect to the sadhak. Very few persons in the world know about this kind of Mahavidya. As per the repeated requests of the disciples Guruji finally have decided to provide this rare mantra.

 ध्यान:

ॐ या चण्डी मधु-कैटभादी-दलनी या माहिषो-न्मुलनी, या धुम्रेक्षण-चण्ड-मुण्ड, मथनी या रक्त-बिजाशनी।
शक्ती-शुम्भ-निशुम्भ-दैत्य-दलनी, या सिद्धी-दांत्री परा सा देवी नव-कोटी-मुर्ती-संहिता मां पातु विश्वेश्वरी।।  

 

सहस्राक्षरी सिद्ध चण्डी महाविधा मंत्र 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं हुं सैं हुं ह सौं स्त्रौं जय जय महालक्ष्मी जगदाघ बीजे सूरासुरत्रिभुवननिदाने,
दयाकारे सर्व-सर्वतेजो रूपिणी, महा महामहिमे-महा-महारूपिणी, महा महामाये महामयास्वरूपिणी विरच्चिसंस्तेतु,
विधिवरदे-चिदानन्दे, विष्णुदेहावृते, महामोहिनी मधुकैटभजिघांसिनी, नित्यवरदानतत्परे, महासुधाब्धीवासिनी
 महामहातेजोधारिणी सर्वाधारे सर्वकारण कारणे, अचिन्तयरूपे, इन्द्रादी निखिलनिर्जरसेविते, सामगान गायिनी
​ पूर्णेद्रिंय कारिणी, विजये जयंति, अपराजिते, सर्वसुंदरी, रक्तांशुके सूर्यकोटि संकाशे, चन्द्र कोटिसुशीतले, अग्निकोटी दहनशोले,

यमकोटिक्रूरे, वायुकोटीवहनशोले, ओंकारनादरुपिणी, निगमागम मार्गदायिनी, महिषासुर निर्दलिनी, धुम्रलोचन क्षयपरायणे, 

चंडमुण्डादि शिरश्च्छेदिनी, रक्तबीजादी, रुधिरशोषिनी; रक्तपानप्रिय महायोगिनी, भूत वैताल भैरवादि तुष्टि विधायिनी, शुम्भनिशुम्भ शिरच्छेदिनी,

निखिलासुर खलखादिनी, त्रिदशराज्यदायिनी, सर्वस्त्रीरत्नरुपिणी, दिव्यदेहे, निर्गुणे, सगुणे, सदसद्रूपधारिणी, स्कन्दवरदे, भक्तत्राणतत्परे, वरे, वरदे, 

सहस्त्राक्षरे अयुताक्षरे, सप्तकोटि चामुण्डारूपिणी, नवकोटि कात्यायनिस्वरुपे, अनेकशक्तयालक्ष्यालक्ष्य स्वरूपे, इन्द्राणी, ब्रम्हाणी, रुद्राणी, कौमारी, 

वैष्णवी, वाराही, शिवदूती, इशानि, भीमे, भ्रामरी, नारसिंहि, त्रयस्त्रिंशतंकोटि देवसेविते, अनंतकोटी, ब्रहमांडनायिके, चतुरशीति, लक्षमुनिजन संस्तेतु,  

सप्तकोटि मन्त्रस्वरूपे, महाकालरात्रि प्रकाशे, कलाकाष्ठदिरूपिणी, चतुर्दशभवन विभवकारिणी, गरुणगामिनी’ क्रोंकार होंकर ह्रौंकार श्रींकार क्लौंकार

जूंकार सौंकार ऐं क्लींकार कांकार ह्सौंकार नानाबीजकूट निर्मितशरीरे, नानाबीज मंत्रराज विराजते, सकलसुन्दरिगण सेविते, चरणाविन्दे, श्रीमहात्रिपुरसुंदरी,

कामेशदयिते, करणैक रस कल्लोलिनी, कल्पवृक्षाध: स्थिते, चिंतामणी द्विपावस्थिते, मणिमंदिरनिवासे, चापनी, खड्गिनी चक्रिणी, दण्डनी, शंखिनी, पद्मिनी, 

निखिल भैरवाराधिनी, समस्तयोगिनी, परिवृते, कालिके, काली तारे, तरले, सुतारे, ज्वालामुखी, छिन्नमस्तिके, भुवनेश्वरी, त्रिपुरे, लोकजननी, विष्णुवक्ष: स्थलालंकारिणी, 

अजिते, अमिते, अमराधिपे, अनूपचरिते गर्भवासुद: खापहारिणी, मुक्तिक्षेत्राधिष्ठायिनी, शिवे, शांतिकुमारिरूपे, देविसुक्त दशशताक्षरे, चैन्द्री, चामुण्डे, 

महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती त्रयीविग्रहे! प्रसीद- प्रसीद, सर्वमनोरथान्, पूरय-पूरय, सर्वारिष्ट-विध्नांश्छेदय छेदय,  सर्वग्रहपीड़ा ज्वरग्रहभयं विध्वंसय-विध्वंसय, 

सर्वत्र त्रिभुवन जीव जांत वशय-वशय, मोक्ष मार्गान् दर्शय-दर्शय, ज्ञानमार्ग प्रकाशय-प्रकाशय, अज्ञानतमो नाशय-नाशय, धनधन्यादी वृद्धिं कुरु-कुरु, सर्वकल्याणीनि! 

कल्पय-कल्पय, मां रक्ष रक्ष, सर्वपद्भ्यो निस्तारय- निस्तारय, मम वज्रशरीरं साधाय- साधाय, ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे स्वाहा.

 


Published on Oct 26th, 2018

Do NOT follow this link or you will be banned from the site!