Durga Aarti


दुर्गा आरती

durga aarti

 

Goddess Durga is the mother of the universe and believed to be the power behind the work of creation, preservation, and destruction of the world. Since time immemorial she has been worshipped as the supreme power of the Supreme Being. Goddess Durga protects her devotees from the evils of the world and at the same time removes their miseries.

 

Goddess Durga is the mother of the universe and believed to be the power behind the work of creation, preservation, and destruction of the world.  Durga is the one who eliminates the sufferings from one's life. Durga is the Ultimate Shakti or Mahashakti, the ultimate power inherent in all Creation.

This powerful Durga Aarti must be practiced after the worship of Goddess Durga. It is believed that one, who practices this Durga Aarti once in a day gets all material comforts and grace of Goddess Durga.


Durga Aarti Text

 

कर्पूरगौरं करुणावतारम्
संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे
भवं भवानि सहितं नमामि

माया कुण्डलिनी क्रिया भगवती काली कलामालिनी
मातंगी विजया जया भगवती देवी शिवा शाम्भवी
शक्ति शंकर-वल्लभा त्रिनयनां वाग्वाहिनी भैरवीं
क्रीम्कारी त्रिपुरा सुरापद्मिनी माता ॐकारेश्वरी

ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी  
तुमको निशि दिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को
उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै

केहरि वाहन राजत, खडग खप्पर धारी
सुर - नर मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्ज मोती
कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति

शुम्भ निशुम्भ विदारत, महिषासुर घाती
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मतमाती

चण्ड - मुण्ड संहारे, शौणित बीज हरे
मधु - कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे

ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी

चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरु
बाजत ताल मृदंगा, और बाजत डमरू

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता
भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता

भुजा आठ अति शोभित, वरमुद्रा धारी
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती
मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति

अम्बे जी की आरती
 जो कोई नर गावे
ओ ज्यौरा मन शुद्ध होय ज़ावै
ओ ज्यौरा पाप परा  ज़ावै

ओ ज्यौरी सुख सम्पति आवे
 ज्यौरा दुख दारिद्र जावै
ओ ज्यौरा घर लक्ष्मी आवै
बनत भोलानन्द स्वामी

रटत शिवानन्द स्वामी
इच्छा फल पावै
जय अम्बे गौरी


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Published on Mar 17th, 2014


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