Guru Shakti

DEVI KEELAK STOTRAM - Meaning & Lyrics


Devi Keelak Stotramdevi keelak stotram
कीलकस्तोत्रम् ॥

Devi Keelak Stotram is the Siddh prayer of Goddess Shakti and is inscribed in Durga Saptashati written by Markandeya Rishi. The Keelak Stotram is generally chanted before completing the Durga Saptashati and after Argala Stotram. In this wonderful Stotra, the sadhak or the devotee make some wishes before Devi to remove the blocks & impediments in bhakti sadhna and in general life. The blocks in energy always leads to disruption and frustration.

The Keelak Stotram removes the curses or blocks in mantra sadhna. It is believed that any sadhak or bhakat who recites this Keelak Stotram gets the divine grace or blessing of the Goddess Durga only by reciting the beautiful stotra. The Keelak Stotram removes blocks from Tantra Sadhna also and is way to get success in Shad-Karmas. It is well written in the Stotra that only by following Durga, one can attain prosperity, abundance, an exuberant life and liberation.

ॐ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य, शिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहासरस्वती देवता,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
ॐ नमश्चण्डिकायै

OM Asya Shrikilakamantrasya Shivar^Ishih, Anushtup Chandah,
Shrimahasarasvati Devata, Shrijagadambaprityartham
Saptashatipatha~Ngatvena Jape Viniyogah |
OM Namashchandikayai |


मार्कण्डेय उवाच-

ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे।।१।।

Markandeya Uvacha .
OM Vishuddhagyanadehaya Trivedidivyachakshushe .
Shreyahpraptinimittaya Namah Somardhadharine  


महर्षि श्री मार्कडेयजी बोले – निर्मल ज्ञानरूपी शरीर धारण करने वाले, देवत्रयी रूप दिव्य तीन नेत्र वाले, जो कल्याण प्राप्ति के हेतु है तथा अपने मस्तक पर अर्द्धचन्द्र धारण करने वाले हैं उन भगवान शंकर को नमस्कार है ॥१॥

सर्वमेतद्विजानीयान्मंत्राणामभिकीलकम्।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जप्यतत्परः।।२।।

Sarvametadvijaniyanmantranamapi Kilakam.
So.Api Kshemamavapnoti Satatam Japyatatparah  


मन्त्रों की सिद्धि में विघ्न उपस्थित करने वाले शाप रूपी कीलक का जो निवारण करनेवाला है, उस सप्तशतीस्तोत्र को सम्पूर्ण रूप से जानना चाहिये (और जानकर उसकी उपासना करनी चाहिये), यद्यपि सप्तशतीके अतिरिक्त अन्य मन्त्रोंके जपमें भी जो निरन्तर लगा रहता है, वह भी कल्याणका भागी होता है॥ २॥

सिद्ध्यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि।
एतेन स्तुवतां देवीं स्तोत्रमात्रेण सिद्धयति।।३।।

Siddhyantyuchchatanadini Karmani Sakalanyapi .
Etena Stuvatam Devim Stotravr^Indena Bhaktitah  


मन्त्रों का जो अभिकीलक है अर्थात् उसके भी उच्चाटन आदि कर्म सिद्ध होते हैं तथा उसे भी समस्त दुर्लभ वस्तुओंकी प्राप्ति हो जाती है; तथापि जो अन्य मन्त्रोंका जप न करके केवल इस सप्तशती नामक स्तोत्र से ही देवीकी स्तुति करते हैं, उन्हें स्तुतिमात्र से ही सच्चिदानन्दस्वरूपिणी देवी सिद्ध हो जाती हैं ॥३॥

न मंत्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते।
विना जाप्येन सिद्ध्येत सर्वमुच्चाटनादिकम्।।४।।

Na Mantro Naushadham Tasya Na Ki~Nchidapi Vidyate .
Vina Japyena Siddhyettu Sarvamuchchatanadikam.


उन्हें अपने कार्य की सिद्धि के लिये मन्त्र, ओषधि तथा अन्य किसी साधन के उपयोग की आवश्यकता नहीं रहती। बिना जप के ही उनके उच्चाटन आदि समस्त आभिचारिक कर्म सिद्ध हो जाते हैं ॥ ४॥

समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशङ्कामिमां हरः।
कृत्वा निमंत्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम्।।५।।

Samagranyapi Setsyanti Lokasha~Nkamimam Harah .
Kr^Itva Nimantrayamasa Sarvamevamidam Shubham.


इतना ही नहीं, उनकी सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ भी सिद्ध होती हैं। लोगों के मन में यह शंका थी कि 'जब केवल सप्तशती की उपासना से अथवा सप्तशती को छोड़कर अन्य मन्त्रोंकी उपासना से भी समानरूप से सब कार्य सिद्ध होते हैं, तब इनमें श्रेष्ठ कौन-सा साधन है?' लोगोंकी इस शंका को सामने रखकर भगवान् शंकरने अपने पास आये हुए जिज्ञासुओं को समझाया कि यह सप्तशती नामक सम्पूर्ण स्तोत्र ही सर्वश्रेष्ठ एवं कल्याणमय है॥५॥

स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः।
समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्निमंत्रणाम्।।६।।

Stotram Vai Chandikayastu Tachcha Guhyam Chakara Sah .
Samapnoti Sa Punyena Tam Yathavannimantranam.


तदनन्तर भगवती चण्डिका के सप्तशती नामक स्तोत्र को महादेवजीने गुप्त कर दिया। सप्तशती के पाठ से जो पुण्य प्राप्त होता है, उसकी कभी समाप्ति नहीं होती; किंतु अन्य मन्त्रों के जपजन्य पुण्य की समाप्ति हो जाती है। अत: भगवान् शिव ने अन्य मन्त्रों की अपेक्षा जो सप्तशती की ही श्रेष्ठता का निर्णय किया, उसे यथार्थ ही जानना चाहिये ॥ ६॥

सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेव न संशयः।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः।।७।।

So.Api Kshemamavapnoti Sarvameva Na Sa.Nshayah .
Kr^Ishnayam Va Chaturdashyamashtamyam Va Samahitah  


अन्य मन्त्रों का जप करने वाला पुरुष भी यदि सप्तशती के स्तोत्र और जप का अनुष्ठान कर ले तो वह भी पूर्णरूप से ही कल्याण का भागी होता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जो साधक कृष्णपक्ष की चतुर्दशी अथवा अष्टमी को एकाग्रचित्त होकर भगवती की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है 

ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति।
इत्थं रूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम्।।८।।

Dadati Pratigr^Ihnati Nanyathaisha Prasidati .
Ittham Rupena Kilena Mahadevena Kilitam.


और फिर उसे प्रसादरूप से ग्रहण करता है, उसी पर भगवती प्रसन्न होती हैं; अन्यथा उनकी प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती। इस प्रकार सिद्धि के प्रतिबन्धक रूप कील के द्वारा महादेवजी ने इस स्तोत्र को कीलित कर रखा है॥ ७-८॥

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम्।
स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः।।९।।

Yo Nishkilam Vidhayainam Chandim Japati Nityashah .
Sa Siddhah Sa Ganah So.Atha Gandharvo Jayate Dhruvam.


जो पूर्वोक्त रीति से निष्कीलन करके इस सप्तशती स्तोत्र का प्रतिदिन स्पष्ट उच्चारणपूर्वक पाठ करता है, वह मनुष्य सिद्ध हो जाता है, वही देवी का पार्षद होता है और वही गन्धर्व भी होता है॥९॥

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात्।।१०।।

Na Chaivapatavam Tasya Bhayam Kvapi Na Jayate .
Napamr^Ityuvasham Yati Mr^Ite Cha Mokshamapnuyat.


सर्वत्र विचरते रहनेपर भी इस संसारमें उसे कहीं भी भय नहीं होता। वह अपमृत्युके वशमें नहीं पड़ता तथा देह त्यागने के अनन्तर मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥ १०॥

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः।।११1।।

Gyatva Prarabhya Kurvita Hyakurvano Vinashyati .
Tato Gyatvaiva Sampurnamidam Prarabhyate Budhaih  


अतः कीलन को जानकर उसका परिहार करके ही सप्तशती का पाठ आरम्भ करे। जो ऐसा नहीं करता, उसका नाश हो जाता है। इसलिये कीलक और निष्कीलन का ज्ञान प्राप्त करने पर ही यह स्तोत्र निर्दोष होता है और विद्वान् पुरुष इस निर्दोष स्तोत्र का ही पाठ आरम्भ करते हैं ॥ ११ ॥

सौभाग्यादि च यत्किञ्चिद् दृश्यते ललनाजने।
तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जप्यमिदम् शुभम्।।१२।।

Saubhagyadi Cha Yatki~Nchid.H Dr^Ishyate Lalanajane .
Tatsarvam Tatprasadena Tena Japyamidam Shubham.


स्त्रियों में जो कुछ भी सौभाग्य आदि दृष्टिगोचर होता है, वह सब देवी के प्रसादका ही फल है। अतः इस कल्याणमय स्तोत्र का सदा जप करना चाहिये ॥ १२॥

शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः।
भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत्।।१३।।

Shanaistu Japyamane.Asmin.H Stotre Sampattiruchchakaih .
Bhavatyeva Samagrapi Tatah Prarabhyameva Tat.


इस स्तोत्र का मन्दस्वर से पाठ करने पर स्वल्प फल की प्राप्ति होती है और उच्च स्वर से पाठ करने पर पूर्ण फल की सिद्धि होती है।
अतः उच्च स्वर से ही इसका पाठ आरम्भ करना चाहिये ॥ १३॥

ऐश्वर्यं तत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः।।१४।।

Aishvaryam Tatprasadena Saubhagyarogyameva Cha .
Shatruhanih Paro Mokshah Stuyate Sa Na Kim Janaih  


जिनके प्रसाद से ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, सम्पत्ति, शत्रुनाश तथा परम मोक्ष की भी सिद्धि होती है, उन कल्याणमयी जगदम्बा की स्तुति मनुष्य क्यों नहीं करते? ॥ १४॥

।।इति श्रीभगवत्याः कीलकस्तोत्रं समाप्तम्।।

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