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Shiv Manas Puja


Shiv Manas Puja - Meaning Shiv Manas Puja
सार्थ श्रीशिवमानसपूजा 

Shiv Manas Puja is a devotional prayer and hymn for Lord Shiva which can easily surrender the devotee in the feet of Lord Shiva. The stotra has been practiced by many devotee and when performed in utmost devotion it yields miracles and 'Anand' in one's life. The 'Ananda' element is incomparable with any happiness of this world. Shiv Manas Puja creates a direct bond with Lord Shiva and helps to achieve 'Moksha' easily.

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदा ङ्कितं चन्दनम् ।
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥ १॥

O ocean of mercy, O master of bound creatures, I have imagined a throne
of precious stones for You, cool water for You to bathe in,
divine robes adorned with many jewels, sandalwood paste mixed
with musk to anoint Your body, jasmine and champaka flowers and
bilva leaves, rare incense, and a shining flame.
Accept all these which I have imagined in my heart for You, O God. 

मैं अपने मन में ऐसी भावना करता हूँ कि हे पशुपति देव! संपूर्ण रत्नों से निर्मित इस सिंहासन पर आप विराजमान होइए।
हिमालय के शीतल जल से मैं आपको स्नान करवा रहा हूँ। स्नान के उपरांत रत्नजड़ित दिव्य वस्त्र आपको अर्पित है।
केसर-कस्तूरी में बनाया गया चंदन का तिलक आपके अंगों पर लगा रहा हूँ।
जूही, चंपा, बिल्वपत्र आदि की पुष्पांजलि आपको समर्पित है।
सभी प्रकार की सुगंधित धूप और दीपक मानसिक प्रकार से आपको दर्शित करवा रहा हूँ, आप ग्रहण कीजिए।


सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् ।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ॥ २॥

Sweet rice in a golden bowl inlaid with the nine jewels, the five
kinds of food made from milk and curd, bananas, vegetables,
sweet water scented with camphor, and betel leaf---
I have prepared all these in my mind with devotion.
O Lord, please accept them. 
मैंने नवीन स्वर्णपात्र, जिसमें विविध प्रकार के रत्न जड़ित हैं, में खीर, दूध और दही सहित पाँच प्रकार के
स्वाद वाले व्यंजनों के संग कदलीफल, शर्बत, शाक, कपूर से सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मृदु जल
एवं ताम्बूल आपको मानसिक भावों द्वारा बनाकर प्रस्तुत किया है। हे कल्याण करने वाले! मेरी इस भावना को स्वीकार करें।


छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं
वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा ।
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ॥ ३॥

A canopy, two yak-tail whisks, a fan and a spotless mirror, a vINA,
kettledrums, a mridang and a great drum, songs and dancing, full prostrations,
and many kinds of hymns--- all this I offer You in my imagination.
O almighty Lord, accept this, my worship of You. 
हे भगवन, आपके ऊपर छत्र लगाकर चँवर और पंखा झल रहा हूँ। निर्मल दर्पण, जिसमें आपका स्वरूप सुंदरतम
व भव्य दिखाई दे रहा है, भी प्रस्तुत है। वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभि आदि की मधुर ध्वनियाँ आपको प्रसन्नता के लिए की जा रही हैं।
स्तुति का गायन, आपके प्रिय नृत्य को करके मैं आपको साष्टांग प्रणाम करते हुए संकल्प रूप से आपको समर्पित कर रहा हूँ।
प्रभो! मेरी यह नाना विधि स्तुति की पूजा को कृपया ग्रहण करें।


आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥ ४॥

You are my Self; pArvatI is my reason. My five prANAs are
Your attendants, my body is Your house, and all the pleasures of
my senses are objects to use for Your worship. My sleep is
Your state of samAdhI. Wherever I walk I am walking around You,
everything I say is in praise of You, everything I do is in devotion to You,
O benevolent Lord! 
हे शंकरजी, मेरी आत्मा आप हैं। मेरी बुद्धि आपकी शक्ति पार्वतीजी हैं। मेरे प्राण आपके गण हैं।
मेरा यह पंच भौतिक शरीर आपका मंदिर है। संपूर्ण विषय भोग की रचना आपकी पूजा ही है।
मैं जो सोता हूँ, वह आपकी ध्यान समाधि है। मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है।
मेरी वाणी से निकला प्रत्येक उच्चारण आपके स्तोत्र व मंत्र हैं। इस प्रकार मैं आपका भक्त
जिन-जिन कर्मों को करता हूँ, वह आपकी आराधना ही है।


करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा ।
                  श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम् ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व ।
                  जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेवशम्भो ॥ ५॥

Whatever sins I have committed with my hands, feet, voice, body, actions,
ears, eyes, or mind, whether prohibited by the scriptures or not,
please forgive them all.  Hail! Hail! O ocean of compassion! O great
God! O benevolent Lord! 
हे परमेश्वर! मैंने हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, कर्ण, नेत्र अथवा मन से अभी तक जो भी अपराध किए हैं।
वे विहित हों अथवा अविहित, उन सब पर आपकी क्षमापूर्ण दृष्टि प्रदान कीजिए।
हे करुणा के सागर भोले भंडारी श्री महादेवजी, आपकी जय हो। जय हो।


॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता शिवमानसपूजा समाप्ता ॥


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Some Useful Links
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